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Saturday, 4 July 2015

CBSE CLASS IX HINDI KSHITIJ CHAPTER 7 MERE BACHAPAN KE DIN BY MAHADEVI VERMA (सी.बी.एस.ई कक्षा नौवीं हिन्दी क्षितिज पाठ ७ मेरे बचपन के दिन)


मेरे बचपन के दिन उदधि डॉट कॉम

मेरे बचपन के दिन

प्रश्न १ - ‘मैं उत्पन्न हुई तो मेरी बड़ी खातिर हुई और मुझे वह सब नहीं सहना पड़ा जो अन्य लड़कियों को सहना पड़ता है।’ इस कथन के आलोक में आप यह पता लगाएँ कि --
(क) - उस समय लड़कियों की दशा कैसी थी?
उत्तर - उस समय से तात्पर्य है - महादेवी वर्मा के जन्म के समय अर्थात् बीसवीं सदी के प्रारंभ का समय। तत्कालिन समय में लड़कियों की बड़ी ही दयनीय दशा थी।उन्हें पैदा होते ही परमधाम भेज दिया जाता था। यदि वे सौभाग्यवश बच जातीं तो आए दिन उनका तिरस्कार होता था साथ ही उनके साथ भेदभाव और अन्याय किया जाता था। उन्हें नाना प्रकार के कष्ट सहने पड़ते थे। शिक्षा-दीक्षा और सम्मान से महरुम उनकी दशा अत्यन्त शोचनीय थी।

(ख) - लड़कियों के जन्म के संबंध में आज कैसी परिस्थितियाँ हैं?
उत्तर - शिक्षा - दीक्षा के प्रसार ने आज लोगों की आँखें खोल दी हैं। सामाजिक संजाल (Social Medias) खासकर फ़ेसबुक , ट्वीटर और टी.वी आदि जैसे संचार - साधनों ने जागरण का मंत्र फूँक दिया है।आज संविधान ने भी लड़कियों को समान अधिकार प्रदान किया है। सरकारी और स्वयंसेवी संस्थाओं ने ‘लड़का-लड़की एक समान’ का नारा दिया है। देश के प्रधानमंत्री ने स्वयं आगे बढ़कर ‘बेटी बचाओ’ आंदोलन चलाया है। ऐसे प्रयासों के कारण लड़का-लड़की में भेद जैसी बातें अब मिथक साबित हो रही हैं। आज लड़कियों के जन्म के संबंध में भले ही लोगों को खुशी न हो रही हो, किन्तु दुख का अनुभव भी नहीं हो रहा। अब उन्हें भी वे तमाम सुविधाएँ प्राप्त होने लगी हैं, जिन पर परंपरा से लड़कों का ही आधिपत्य था।

प्रश्न २ - लेखिका उर्दू-फ़ारसी क्यों नहीं सीख पाई?
उत्तर  - लेखिका को उर्दू-फ़ारसी सीखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। अपने पिताजी की इच्छाओं का सम्मान कहिए अथवा डर के कारण उन्होंने उर्दू-फ़ारसी सीखने की हामी भरी थी। अरुचि के कारण उन्हें उर्दू - फ़ारसी सीखना भी कठिन लग रहा था। जिस दिन मौलवी साहब उसे पढ़ाने आए, उनकी दाढ़ी देखकर लेखिका डर गई और घर के भीतर जाकर चारपाई के नीचे  छिप गई। अंततः मौलवी साहब को वापस जाना पड़ा और उसके बाद लेखिका फिर कभी उर्दू-फ़ारसी नहीं सीख पाई।

प्रश्न ३ - लेखिका ने अपनी माँ की किन विशेषताओं का उल्लेख किया है?
उत्तर  - लेखिका ने अपनी माँ के बारे में बताया है कि वे एक धार्मिक महिला थीं। हिन्दी और संस्कृत का ज्ञान रखने वाली उनकी माता भजन भी लिखती थीं। लिखने के साथ-साथ उन्हें गाने का भी शौक था। धार्मिक होने के कारण वे सवेरे प्रभाती और शाम को साँझा गाती थीं। मीरा के पद उन्हें बेहद पसंद थे।

प्रश्न ४ - जवारा के नवाब के साथ अपने पारिवारिक संबंधों को लेखिका ने आज के संदर्भ में स्वप्न जैसा क्यों कहा है?
उत्तर  - जवारा के नवाब के साथ लेखिका के पारिवारिक संबंध अत्यन्त घनिष्ठ एवम् अपनों से भी आत्मीय थे। दोनों परिवार प्राय: प्रत्येक तीज-त्योहार एक-दूसरे से मिलजुल कर मनाता था। आज जबकि सगे भाइयों अथवा अपनों के साथ किसी की नहीं बनती, तब भला हिन्दू-मुस्लिम जो स्वतंत्रता-प्राप्ति अथवा देश के बँटवारे के बाद एक - दूसरे के घोर विरोधी हो गए हैं ; उन दो ध्रुवों का मिलन कैसे संभव हो सकता है। यही कारण है कि जवारा के नवाब के साथ अपने पारिवारिक संबंधों को लेखिका ने आज के संदर्भ में स्वप्न जैसा कहा है।

प्रश्न ५ - ज़ेबुन्निसा महादेवी वर्मा के लिए बहुत काम करती थी। ज़ेबुन्निसा के स्थान पर यदि आप होतीं / होते तो महादेवी से आपकी क्या अपेक्षा होती?
उत्तर  - ज़ेबुन्निसा के स्थान पर यदि मैं होता , तो अपने किए के बदले में कुछ पाने का ख़्वाहिशमंद रहता। साथ ही मैं महादेवी से उम्मीद करता कि वे हमारा सम्मान करें। इसके अलावा मैं चाहता कि समय - समय पर महादेवी भी मेरा कार्य कर दिया करें ।

प्रश्न ६ - महादेवी वर्मा को काव्य प्रतियोगिता में चाँदी का कटोरा मिला। अनुमान लगाइए कि आपको इस तरह का कोई पुरस्कार मिला हो और वह देशहित में या किसी आपदा निवारण के काम में देना पड़े तो आप कैसा अनुभव करेंगे / करेंगी?
उत्तर - कोई भी पुरस्कार देशहित से बड़ा नहीं हो सकता। यदि देश की सेवा किसी भी रुप में किंचित् भी कर सका , तो मैं स्वयम् को बड़ा भाग्यशाली समझूँगा। यदि मुझसे कहा जाता कि पुरस्कार में प्राप्त चाँदी का कटोरा देश के हितार्थ दे दो , तब मुझे बड़ी प्रसन्न्ता होती। ऐसे में यदि मुझे कोई सोने का कटोरा भी मिला होता तो उसे भी मैं ‘राष्ट्राय स्वाहा , इदं न मम’ की भावना के साथ दे देता।

प्रश्न ७ - लेखिका ने छात्रावास के जिस बहुभाषी परिवेश की चर्चा की है , उसे अपनी मातृभाषा में लिखिए।
उत्तर - मेरी मातृभाषा भोजपुरी है। अत: मैं उस परिवेश की चर्चा भोजपुरी में ही कर रहा हूँ।
महादेवी जी जवना छात्रावास में रहत रहली , ओमे अलग-विलग भाषा बोलेवाला के भरमार रहे। केहू हिन्दी , केहू मराठी , केहू फ़ारसी तऽ केहू संस्कृतो बोलेवाला रहे। बूंदेली , अवधी , ब्रजभाषा आऽ भोजपुरी के तऽ बाते मत पूछीं। अँगुरी पर गिनल मुसकिल हो जाई। कहे के मतलब जे कौनो भाषा शाएदे जे बाकी रहे। हँऽऽ इ एगो अलग बात रहे कि खाना - पीना सभे एके मेस में , एकट्ठे खात रहे , आऽ पढ़ाई - लिखाई भी सबकर एकही भाषा में होत रहे।



॥ इति शुभम् ॥

अगला पाठ क्रमश: अगले पोस्ट में.....
विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी’

Sunday, 28 June 2015

CBSE CLASS IX HINDI KSHITIJ CHAPTER 6 PREM CHAND KE PHATE JOOTE BY HARISHANKAR PARASAI (सी.बी.एस.ई कक्षा नौवीं हिन्दी क्षितिज पाठ ६ प्रेमचंद के फ़टे जूते)



प्रश्न 1 - हरिशंकर परसाई ने प्रेमचंद का जो शब्द-चित्र हमारे सामने प्रस्तुत किया है उससे प्रेमचंद के व्यक्तित्व की कौन - कौन सी विशेषताएँ उभरकर सामने आती हैं?
उत्तर  - प्रेमचंद का जीवन कष्टों से भरा था। वे सदैव जीवन की आवश्यक आवश्यकताओं (रोटी,कपड़ा और मकान) की पूर्ति के लिए जूझते और तरसते रहे। संघर्षशीलता , जुझारुपन , जिजीविषा , धैर्य , सादग़ी एवं परदुख-कातरता के अलावा रूढ़ियों तथा बाह्याडंबरों का विरोध उनके स्वभाव में शामिल था। प्रेमचंद का व्यक्तित्व एक मर्यादित लेखक का है, जिनका साहित्य समाज के लिए दर्पण का काम करता है।

प्रश्न 2 - कथन के सामने सही / गलत लिखिए।
(क) - बाएँ पाँव का जूता ठीक है मगर दाहिने जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अँगुली बाहर निकल आई है।
उत्तर - ग़लत  ।

(ख) - लोग तो इत्र चुपड़कर फ़ोटो खिचाते हैं जिससे फ़ोटो में खुशबू आ जाए।
उत्तर - सही  । 

(ग) - तुम्हारी यह व्यंग्य मुस्कान मेरे हौसले बढ़ाती है।
 उत्तर - ग़लत  ।

(घ) - तुम जिसे घृणित समझते हो, उसकी तरफ़ अंगूठे से इशारा करते हो?
उत्तर - ग़लत  ।

प्रश्न ३-नीचे दी गई पंक्तियों में निहित व्यंग्य स्पष्ट कीजिए:-
(क) - जूता हमेशा टोपी से क़ीमती रहा है। अब तो जूते की क़ीमत और भी बढ़ गई है और एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर होती हैं।
उत्तर - जूते का स्थान पैरों में होता है जबकि टोपी शीश पर शोभा पाती है। किन्तु ; आज जूते की क़ीमत बढ़ गई है । तात्पर्य यह कि आज अयोग्य को सम्मानित किया जा रहा है , जबकि टोपी अर्थात् बुद्धिमान और विद्वान को कोई पूछता भी नहीं। आज ‘विद्या धनं सर्वधन प्रसाधनम्’ की बात बेमानी-सी लगती है।आज सरस्वती पर लक्ष्मी भारी पड़ती-सी जान पड़ती है। अर्थात् एक धनवान के आगे-पीछे पचीसों विद्वान डोलते नज़र आते हैं।

(ख) - तुम पर्दे का महत्व ही नहीं जानते हम पर्दे पर कुर्बान हो रहे हैं।
उत्तर - लेखक ने प्रेमचंद के पहनावे को लक्ष्य करके इस सत्य को उजागर किया है कि वे दिखावा-पसंद न थे।सच पर पर्दा डालना उनके स्वभाव में शामिल न था।इसके साथ ही लेखक ने अपने माध्यम से समाज की सचाई पर पर्दा डालने एवम् ढोंग और दिखावा करने जैसी मानसिकता पर करारा व्यंग्य किया है।

(ग) - जिसे तुम घृणित समझते हो , उसकी तरफ़ हाथ की नहीं , पाँव की अँगुली से इशारा करते हो।
उत्तर - लेखक के अनुसार प्रेमचंद ने समाज में व्याप्त घृणित विचार-धाराओं,आदर्शों , मान्यताओं एवम् सामाजिक विकास को बाधित करनेवाली रुढ़ियों और परम्पराओं के साथ-साथ जिसे भी घृणित समझा , उसके साथ उन्होंने कभी नरमी नहीं दिखाई। उसकी ओर अँगुली या हाथ नहीं उठाया बल्कि उसे लातों और जूतों के योग्य समझा। तात्पर्य यह कि प्रेमचंद का व्यक्तित्व घृणितों का सफ़ाया कड़ाई से करने का संदेश देता है।

प्रश्न ४ - पाठ में लेखक एक जगह पर सोचता है कि ‘फ़ोटो खिचाने की अगर यह पोशाक है तो पहनने की कैसी होगी?’ लेकिन अगले ही पल वह विचार बदलता है कि ‘नहीं, इस आदमी की अलग - अलग पोशाकें नहीं होंगी।’ आपके अनुसार इस संदर्भ में प्रेमचंद के बारे में लेखक के विचार बदलने की क्या वज़हें हो सकती हैं?
उत्तर - मेरे अनुसार पोशाक के संदर्भ में प्रेमचंद के बारे में लेखक के विचार बदलने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं:-
पहला तो यह कि फ़ोटो खिंचाने के लिए जैसे सभी अच्छी पोशाकें पहनते हैं; प्रेमचंद ने भी कुछ वैसा ही किया था, यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है क्योंकि पहनने के लिए उससे ख़राब वस्त्र हो भी नहीं सकते थे। अर्थात् वही पोशाक सबसे अच्छी थी, जिसे वे पहने थे। दूसरा कारण ; प्रेमचंद का सीधा , सरल व दिखावा या पाखंड-रहित जीवन हो सकता है , क्योंकि प्रेमचंद के जीवन में कोई लुकाव-छिपाव नहीं था। वे जैसे थे , वैसे दिखते थे । शायद इन्हीं बातों के परिप्रेक्ष्य में लेखक ने अपने विचार बदले होंगे।

प्रश्न ५ - आपने यह व्यंग्य पढ़ा। इसे पढ़कर आपको लेखक की कौन - सी बातें आकर्षित करती हैं?
उत्तर  - इस लेख की रचना शैली बेहद आकर्षक है। लेखक ने मूलत: गागर में सागर भरने जैसी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। इस लेख का विस्तार ठीक किसी नदी के विस्तार की तरह है। जिस प्रकार अपने उद्गम - स्थल पर नदी पानी की एक पतली रेखा होती है और क्रमश: उसका विस्तार होते जाता है , ठीक उसी तरह इस लेख की शुरुआत प्रेमचंद के एक फ़ोटो से होती है, जिसमें उनका फ़टा जूता देखकर लेखक सोचने लगता है। फिर तो सोचते ही विचारों का ताँता लग जाता है। बातों ही बातों में प्रेमचंद के समस्त व्यक्तित्व को पाठक की आँखों के सामने चलचित्र की भाँति साकार करने की लेखक की क़ाबिलियत ने मुझे बहुत प्रभावित किया।

प्रश्न ६ - इस पाठ में ‘टीले’ शब्द का प्रयोग किन संदर्भों को इंगित करने के लिए किया गया होगा?
उत्तर  - प्रस्तुत पाठ में ‘टीला’ विकास के मार्ग में अवरोध का सूचक है। जिस प्रकार ऊँचे और बड़े टीले मार्ग अवरुद्ध कर देते हैं; ठीक उसी प्रकार समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार , जीर्ण-शीर्ण रीतियाँ , व्यर्थ के रस्म और रीवाज़ तथा परम्परागत कुरीतियाँ सामाजिक विकास की गति में बाधा पहुँचाती हैं, अवरोध उत्पन्न करती हैं। यहाँ ‘टीले’ शब्द का प्रयोग तत्कालिन समय में व्याप्त ऐसी ही समस्याओं या बाधाओं के लिए हुआ है।

प्रश्न ७ - प्रेमचंद के फ़टे जूते को आधार बनाकर परसाई जी ने यह व्यंग्य लिखा है। आप भी किसी व्यक्ति की पोशाक को आधार बनाकर एक व्यंग्य लिखिए।

उत्तर  -      स्वयम्    लिखें... :-)


प्रश्न ८ - आपकी दृष्टि में वेश - भूषा के प्रति लोगों की सोच में आज क्या परिवर्तन आया है?
उत्तर  - समय परिवर्तनशील है। अत: यहाँ कुछ भी चिरस्थायी नहीं है। चाहे वह परिस्थिति हो या अथवा विधि-विधान या खान-पान । हम पहनावा को ही ले। पहले सर्दी , गर्मी और बरसात से बचने या तन ढँकने के लिए पोशाक धारण किया जाता था। बदलते समय ने वेश-भूषा की अवधारणा ही बदल दी है। आज वेश - भूषा सामाजिक रुतबा का प्रतीक बन गया है। यह लोगों को मान-सम्मान दिलाता है। स्वयं को खास दिखाने या सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए विभिन्न सरकारी - ग़ैरसरकारी संस्थाओं , स्कूलों आदि ने अपनी अपनी वेश-भूषा निर्धारित कर रखा है। लोग अपनी औक़ात से ज्यादा पहनावे पर खर्च करते हैं। पिछले साल का फ़ैशन इस साल भी करना पिछड़ेपन का सबूत माना जाता है। आज वेश - भूषा आधुनिकता का पर्याय बन गया है। यह बदलता मिज़ाज और मानसिकता निश्चित रूप से चिन्ता का विषय है। 


॥ इति शुभम् ॥

अगला पाठ क्रमश: अगले पोस्ट में.....

विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी’ 

Tuesday, 2 June 2015

Sunday, 5 April 2015

HINDI VYAKARAN -PRATYAYA - HINDI GRAMMAR- SUFFIX (प्रत्यय-कृत प्रत्यय-तद्धित प्रत्यय)


शब्द - निर्माण
प्रत्यय
किसी मूल शब्द के आगे या पीछे जुड़ने वाले अंश को शब्दांश कहते हैं। किसी शब्द के साथ जब कोई शब्दांश जुड़ता है, तो उस शब्द का स्वरुप तो बदलता ही है , साथ ही उसके अर्थ में भी परिवर्तन आ जाता है।

शब्दांश दो प्रकार के होते हैं ==>

1. शब्दों के पहले जुड़ने वाले शब्दांश ==> जो शब्दांश शब्दों के पहले जुड़ते हैं, उन्हें उपसर्ग कहा जाता है।

जैसे ==> प्र + हार = प्रहार ।   

यहाँ ‘प्र’ एक शब्दांश है जो ‘हार’ शब्द के पहले जुड़ा है। इसके जुड़ने से ‘हार’ शब्द का स्वरुप बदल गया है तथा उसके अर्थ में भी बदलाव आ गया है। इस प्रकार हम कह सकते है कि.......
उपसर्ग एक ऐसा शब्दांश है जो किसी शब्द के पहले लगकर उसके रुप और अर्थ में परिवर्तन ला देता है। 

2. शब्दों के बाद जुड़ने वाले शब्दांश ==> जो शब्दांश शब्दों के बाद जुड़ते हैं, उन्हें प्रत्यय कहा जाता है।

जैसे ==> पढ़ (ना) + आई = पढ़ाई ।

यहाँ ‘आई’ एक शब्दांश है जो ‘पढ़’ शब्द के बाद जुड़ा है। इसके जुड़ने से ‘पढ़’ शब्द का स्वरुप बदल गया है तथा उसके अर्थ में भी बदलाव आ गया है। इस प्रकार हम कह सकते है कि.......
प्रत्यय एक ऐसा शब्दांश है जो किसी शब्द के बाद में लगकर उसके रुप और अर्थ में परिवर्तन ला देता है। 


प्रत्यय

जो शब्दांश धातु रूप या शब्दों के अंत में लगकर नए शब्दों का निर्माण करते हैं, उन्हें प्रत्यय कहते हैं।
**शब्दों के साथ प्रत्यय के लग जाने से उस शब्द का स्वरुप तो बदलता ही है साथ ही उसके अर्थ में भी परिवर्तन आ जाता है।

जैसे ==> लिख (ना) + आवट = लिखावट

प्रत्यय के भेद
(क) ==> कृत प्रत्यय
(ख) ==> तद्धित प्रत्यय

(क) - कृत प्रत्यय ==>जो प्रत्यय (शब्दांश) क्रिया के मूल धातु-रूप के साथ लगकर नए शब्दों (संज्ञा और विशेषणों) का निर्माण करते हैं, वे कृत प्रत्यय कहलाते हैं। 
**कृत प्रत्यय के योग से बने शब्दों को ‘कृदन्त-शब्द’ कहा जाता हैं।

जैसे ==> उड़ (ना) + आन = उड़ान ।

यहाँ ‘उड़’ (ना) क्रिया शब्द है जिसके बाद ‘आन’ प्रत्यय जुड़ा है। इसलिए बना हुआ नया शब्द ‘उड़ान’ कृदन्त-शब्द कहलाएगा।


कृत प्रत्यय

1 . कर्तृवाचक कृदन्त प्रत्यय ==> वह प्रत्यय जो किसी शब्द से जुड़कर किसीकार्य करनेवाले अर्थात् कर्ता का बोध कराए, वह कर्तृवाचक कृदन्त प्रत्यय कहलाता है।
**कर्तृवाचक कृदन्त की पहचान ==> अक , अक्कड़ , आक, आकु , आऊ , इका , एरा , ऐया , वाला और वैया आदि प्रत्यय वाले शब्द  कर्तृवाचक कृदन्त होते हैं।

जैसे ==> 
अक ==> चल (ना)  + अक = चालक
अक्कड़ ==> घूम (ना) + अक्कड़ = घुमक्कड़
आक ==> तैर (ना)  + आक = तैराक
आकु ==> लड़ (ना)  + आकु = लड़ाकु
आऊ ==> बिक (ना) + आऊ = बिकाऊ 
इका ==> पाल (ना)  + इका = पालिका 
एरा  ==> लुट (ना)  + एरा = लुटेरा
ऐया ==> भूल (ना)  + ऐया = भुलैया
वाला ==> रख (ना) + वाला = रखवाला
वैया ==> गा  (ना)  + वैया = गवैया

2. कर्मवाचक कृदन्त प्रत्यय ==> वह प्रत्यय जो किसी शब्द से जुड़कर किसी क्रिया के कर्म का बोधक बन जाए कराए अर्थात् कर्म का बोध कराए, वह कर्मवाचक कृदन्त प्रत्यय  कहलाता है।
**कर्मवाचक कृदन्त की पहचान ==> आ ,  आन , आनी , आव , आवा , औती, त , ति , ना और नी आदि प्रत्यय वाले शब्द  कर्मवाचक कृदन्त होते हैं।

जैसे ==>
आ  ==> पूज   + आ   = पूजा
आन ==> लग  + आन  = लगान
आनी ==> कह  + आनी = कहानी
आव ==> कट  + आव  = कटाव
आवा ==> बोल + आवा  = बुलावा
औती ==> फिर + औती  = फिरौती
त   ==> बच  + त    = बचत
ति  ==> ग   +  ति   = गति
ना  ==> खा   +  ना   = खाना
नी  ==> मथ  +  नी   = मथनी

3. करणवाचक कृदन्त प्रत्यय ==> वह प्रत्यय जो किसी शब्द से जुड़कर किसी क्रिया के होने के माध्यम या साधन अर्थात् करण का बोध कराए , वह करणवाचक कृदन्त प्रत्यय  कहलाता है।
**करणवाचक कृदन्त की पहचान ==> अन , आ ,  आवन , आस , औना , आरी , ऊ , न , नी और री आदि प्रत्यय वाले शब्द  करणवाचक कृदन्त होते हैं।

जैसे ==>
अन ==> ढक + अन = ढक्कन
आ  ==> तुल +  आ = तुला
आवन ==> जल + आवन = जलावन
आस ==> निक + आस = निकास
औना ==> खेल + औना = खिलौना
आरी ==> कट + आरी = कटारी
ऊ  ==> झाड़ +  ऊ = झाड़ू
न  ==> बेल +  न  = बेलन
नी ==> फूँक + नी = फूँकनी
री  ==> फाँस +  री = फँसरी

4. भाववाचक कृदन्त प्रत्यय ==> वह प्रत्यय जो किसी शब्द से जुड़कर किसी क्रिया के होने के भाव का बोध कराए , वह भाववाचक कृदन्त प्रत्यय  कहलाता है।
**भाववाचक कृदन्त की पहचान ==> अन, आन ,आप , आवट , आवा, आस, आहट , इयल , ई , न आदि प्रत्यय वाले शब्द भाववाचक कृदन्त होते हैं।

जैसे ==> 
अन ==> खन + अन = खनन
आन ==> उड़ + आन = उड़ान
आप ==> मिल + आप = मिलाप
आवट ==> थकन + आवट = थकावट
आवा ==> पहन + आवा = पहनावा
आस ==> पी  + आस = प्यास
आहट ==> घबरा = आहट = घबराहट
इयल ==> मर + इयल = मरियल
ई  ==> हँस +  ई = हँसी
न  ==> चल + न = चलन

5. क्रियावाचक कृदन्त प्रत्यय ==> वह प्रत्यय जो किसी शब्द से जुड़कर क्रियात्मकता अर्थात् किसी क्रिया के होने का बोध कराए , वह क्रियावाचक कृदन्त प्रत्यय  कहलाता है।
**क्रियावाचक कृदन्त की पहचान ==> अन , आन , आप , आवट ,आवा, आस , आहट , इयल , ई , न आदि प्रत्यय वाले शब्द भाववाचक कृदन्त होते  हैं।

जैसे ==> 
आ ==> लिख + आ = लिखा
एगा ==> कह + एगा = कहेगा
कर ==> थक + कर = थककर
ता ==> जा + ता = जाता
ना ==> बैठ + ना = बैठना
नी ==> हो + नी = होनी
या ==> रो + या = रोया
वा ==> पढ़ + वा = पढ़वा
वाई ==> सुन + वाई = सुनवाई
वाही ==> कार्य + वाही = कार्यवाही

**********************************************************

(ख) - तद्धित प्रत्यय ==> जो प्रत्यय क्रिया अथवा धातु को छोड़कर अन्य शब्दों अर्थात् संज्ञा,सर्वनाम या विशेषण शब्दों के साथ लगते हैं , उन्हें तद्धित प्रत्यय कहते हैं।

जैसे ==> समाज + इक = सामाजिक ।

1. कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय ==> वह प्रत्यय जो किसी शब्द से जुड़कर किसी कार्य करनेवाले अर्थात् कर्ता का बोध कराए, वह कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाता है।
**कर्तृवाचक तद्धित की पहचान ==> आ , आर, इन , एरा , क , कार , गर , ची , दार और वाला आदि प्रत्यय वाले शब्द  कर्तृवाचक तद्धित होते हैं।

जैसे ==> 

आ ==> गोल +  आ = गोला
आर ==> सोना + आर = सुनार
इन ==> सुनार + इन = सुनारिन
एरा ==> लुटना + एरा = लुटेरा
क ==> लेख + क = लेखक
कार ==> कला + कार = कलाकार
गर ==> जादू + गर = जादूगर
ची ==> तोप + ची = तोपची
दार ==> चौकी + दार = चौकीदार
वाला ==> दूध + वाला = दूधवाला

2. भाववाचक तद्धित प्रत्यय ==> वह प्रत्यय जो किसी शब्द से जुड़कर किसी भाव का बोध कराए , वह भाववाचक तद्धित प्रत्यय  कहलाता है।
भाववाचक तद्धित की पहचान ==> आई , आस , आना , आहट , इत , ईना , ता , त्व , पा , ई और पन आदि प्रत्यय वाले शब्द  भाववाचक तद्धित होते हैं।

जैसे ==> 
आई ==> अच्छा + आई = अच्छाई
आस ==> मीठा + आस = मिठास
आना ==> मेहनत + आना = मेहनताना
आहट ==> गरम = आहट = गरमाहट
इत ==> हर्ष + इत = हर्षित
ईना ==> कम +  ईना = कमीना
ता ==> महान + ता = महानता
त्व ==> कवि + त्व = कवित्व
पा  ==> बूढ़ा +  पा = बुढ़ापा
पन ==>  बच्चा + पन = बचपन

3. गुणवाचक तद्धित प्रत्यय ==> वह प्रत्यय जो किसी शब्द से जुड़कर उसका गुण या दोष का बोध कराए , वह गुणवाचक तद्धित प्रत्यय  कहलाता है।
**गुणवाचक तद्धित की पहचान ==> आ , आलु , इल , ईला , ई , ऊ , एलू , ऐल , ऐला और बाज आदि प्रत्यय वाले शब्द  गुणवाचक तद्धित होते हैं।

जैसे ==> 
आ ==> मैल + आ = मैला
आलु ==> दया + आलु = दयालु
इल ==> पंक + इल = पंकिल
ईला ==> ज़हर + ईला = ज़हरीला
ई ==> लालच + ई = लालची
ऊ ==> बाज़ार + ऊ = बाज़ारू
एलू ==> घर + एलू = घरेलू
ऐल ==> गुस्सा + ऐल = गुस्सैल
ऐला ==> विष + ऐला = विषैला
बाज ==> दग़ा + बाज = दग़ाबाज

4. संबन्धवाचक तद्धित प्रत्यय ==> वह प्रत्यय  जो किसी शब्द से जुड़कर उस शब्द को संबन्ध वाचक शब्द बना दे , वह संबन्ध वाचक तद्धित प्रत्यय  कहलाता है।
** संबन्धवाचक तद्धित की पहचान ==> आई , आना , आनी , आल , इक , इन , एरा , ओई , जा और हर आदि प्रत्यय वाले शब्द  संबन्धवाचक तद्धित होते हैं।

जैसे ==> 
आई ==> जम + आई = जमाई 
आना ==> घर + आना = घराना
आनी ==> जेठ + आनी = जेठानी
आल ==> ससुर + आल = ससुराल
इक ==> पितृ + इक = पैतृक
इन ==> नाती + इन = नातिन
एरा ==> मामा + एरा = ममेरा
ओई ==> बहन + ओई = बहनोई
जा ==> भ्रातृ + जा = भ्रातृजा
हर ==> दादा + हर = ददहर

5. उपनाम / व्यवसाय  अथवा जातिवाचक तद्धित प्रत्यय ==> वह प्रत्यय जो किसी शब्द से जुड़कर किसी उपनाम अथवा व्यवसाय की ओर संकेत करे अर्थात् किसी जाति का बोध कराए, वह उपनाम / व्यवसाय  अथवा जातिवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाता है।
** जातिवाचक तद्धित की पहचान ==> अक , आइन , आर , इया , ई , एरा , कार , ची , वाई और वाला आदि प्रत्यय वाले शब्द  जातिवाचक तद्धित होते हैं।

जैसे ==>

अक ==> शिक्षा + अक = शिक्षक 
आइन ==> पंडित + आई = पंडिताई
आर ==> सोना + आर = सुनार
इया ==> गोरखपुर + इया = गोरखपुरिया
ई ==> पंजाब + ई = पंजाबी
एरा ==> ठाठा + एरा = ठठेरा
कार ==> मूर्ति + कार = मूर्तिकार
ची ==> तोप + ची = तोपची
वाई ==> हल + वाई = हलवाई
वाला ==> दूध + वाला = दूधवाला

6. ऊनवाचक तद्धित प्रत्यय ==> वह प्रत्यय जो किसी शब्द से जुड़कर उसकी ऊनता की ओर संकेत करे अर्थात् उसकी लघुता का बोध कराए, वह ऊनवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाता है।
** ऊनवाचक तद्धित की पहचान ==> इया , ई , ऊटा , एली , औड़ी , औरी , ड़ी , नी , री , और ली आदि प्रत्यय वाले शब्द  ऊनवाचक तद्धित होते हैं।

जैसे ==>

इया ==> नाद   + इया = नदिया
ई   ==> घंटा   +   ई = घंटी 
ऊटा ==> काला  + ऊटा = कलूटा
एली ==> हाथ   + एली = हथेली
औड़ी ==> हाथ  + औड़ी = हथौड़ी
औरी ==> निम्ब + औरी = निम्बौरी
ड़ी   ==> पग   +   ड़ी = पगड़ी
नी   ==> छक  +   नी = छकनी
री   ==> कोठा  +   री = कोठरी
ली  ==> मच्छ  +   ली = मछली

7. गणनावाचक तद्धित प्रत्यय ==> वह प्रत्यय  जो किसी शब्द से जुड़कर उस शब्द को संख्या  बोधक अर्थात् गणनावाचक शब्द बना दे , वह गणनावाचक तद्धित प्रत्यय  कहलाता है।
** गणनावाचक तद्धित की पहचान ==> आ , ओं , गुना , तीय , था , रा , वाँ , वीं , वें और हरा आदि प्रत्यय वाले शब्द  गणनावाचक तद्धित होते हैं।

जैसे ==>

आ  ==> पहल +  आ = पहला
ओं  ==> लाख +  ओं = लाखों
गुना ==> दो   + गुना = दोगुना 
तीय ==> द्वि  + तीय = द्वितीय 
था  ==>  चौ  +   था = चौथा
रा   ==> तीस +   रा = तीसरा
वाँ  ==> पाँच  +   वाँ = पाँचवाँ
वीं  ==> आठ  +   वीं = आठवीं
वें   ==>  नौ  +   वें  = नौवें
हरा ==>  दो   +  हरा = दोहरा

॥ इति शुभम् ॥

विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी’

अगले पोस्ट में हम क्रमश: उपसर्ग की बात करेंगे ====>>>>

Monday, 2 March 2015

SENTENCE TRANSFORMATION IN HINDI - VAKYA PARIVARTAN (वाक्य-परिवर्तन)

 अर्थ के आधार पर वाक्य-परिवर्तन

वाक्य के अर्थ में बिना किसी तरह के बदलाव किए उसे एक प्रकार से दूसरे प्रकार के वाक्य में परिवर्तित करना ही वाक्य-परिवर्तन कहलाता है।

(क) - विधानवाचक वाक्य का परिवर्तन==>

जैसे ==>                 मेघा रोटी बनाती है।
 
१ - विधानवाचक वाक्य    ==> मेघा रोटी बनाती है।
२ - आज्ञावाचक वाक्य     ==> मेघा! रोटी बनाओ ।
३ - निषेधवाचक वाक्य     ==> मेघा रोटी नहीं बनाती है।
४ - प्रश्नवाचक वाक्य      ==> क्या मेघा रोटी बनाती है?
५ - विस्मयादिवाचक वाक्य ==> अरे! मेघा रोटी बनाती है।
६ - इच्छावाचक वाक्य     ==> काश! मेघा रोटी बनाती।
७ - संदेहवचक वाक्य      ==> मेघा रोटी बनाती होगी।
८ - संकेतवाचक वाक्य==>यदि मेघा रोटी बनाती तो गोलू भूखा न जाता।
 



(ख) - आज्ञावाचक वाक्य का परिवर्तन ==>
 जैसे ==>              अंश! पढ़ाई करते रहो ।
 
१ - विधानवाचक वाक्य    ==> अंश पढ़ रहा है।
२ - आज्ञावाचक वाक्य     ==> अंश पढ़ाई करते रहो।
३ - निषेधवाचक वाक्य     ==> अंश पढ़ाई नहीं कर रहा है।
४ - प्रश्नवाचक वाक्य      ==> क्या अंश पढ़ रहा है?
५ - विस्मयादिवाचक वाक्य ==> अरे! अंश पढ़ रहा है।
६ - इच्छावाचक वाक्य     ==> काश!अंश पढ़ रहा होता।
७ - संदेहवचक वाक्य      ==> संभवत: अंश पढ़ रहा होगा।
८ - संकेतवाचक वाक्य     ==> अगर अंश पढ़ रहा होता तो प्रथम आता।


(ग) - निषेधवाचक वाक्य का परिवर्तन ==>

जैसे ==>            रोजा शतरंज नहीं खेलती है।
 
१ - विधानवाचक वाक्य    ==> रोज़ा को शतरंज खेलना नहीं आता है।
२ - आज्ञावाचक वाक्य     ==> रोज़ा ! शतरंज मत खेलो।
३ - निषेधवाचक वाक्य     ==> रोजा शतरंज नहीं खेलती है।
४ - प्रश्नवाचक वाक्य      ==> क्या रोजा शतरंज नहीं खेलती है?
५ - विस्मयादिवाचक वाक्य ==> धत् ! रोजा शतरंज नहीं खेलती है।
६ - इच्छावाचक वाक्य     ==> काश ! रोज़ा शतरंज खेलती।
७ - संदेहवचक वाक्य      ==> संभव है रोजा शतरंज नहीं खेलती हो।
८ - संकेतवाचक वाक्य     ==> यदि रोजा शतरंज नहीं खेलती,तो दिमाग तेज                               नहीं होगा।


(घ) - प्रश्नवाचक वाक्य का परिवर्तन ==>

  जैसे ==>            क्या तरन्नुम बाज़ार जाएगी?
 
१ - विधानवाचक वाक्य    ==> तरन्नुम बाज़ार जाएगी।
२ - आज्ञावाचक वाक्य     ==> तरन्नुम ! तुम बाज़ार जाओगी।
३ - निषेधवाचक वाक्य     ==> तरन्नुम बाज़ार नहीं जाएगी।
४ - प्रश्नवाचक वाक्य      ==> क्या तरन्नुम बाज़ार जाएगी?
५ - विस्मयादिवाचक वाक्य ==> ओह ! तरन्नुम बाज़ार जाएगी।
६ - इच्छावाचक वाक्य     ==> काश ! तरन्नुम बाज़ार जाती।
७ - संदेहवचक वाक्य      ==> संभव है तरन्नुम बाज़ार चली गई होगी।
८ - संकेतवाचक वाक्य ==>यदि तरन्नुम बाज़ार जाएगी तो खाना नहीं बनेगा।

 (ङ) - विस्मयादिवाचक वाक्य का परिवर्तन ==>

 
जैसे ==>            अरे ! रोज़ी हिन्दी भी पढ़ लेती है । 

१ - विधानवाचक वाक्य    ==> रोज़ी हिन्दी भी पढ़ लेती है।
२ - आज्ञावाचक वाक्य     ==> रोज़ी ! हिन्दी भी पढ़ो।
३ - निषेधवाचक वाक्य     ==> रोज़ी हिन्दी नहीं पढ़ती है।
४ - प्रश्नवाचक वाक्य      ==> क्या रोज़ी हिन्दी भी पढ़ लेती है?
५ - विस्मयादिवाचक वाक्य ==> अरे ! रोज़ी हिन्दी भी पढ़ लेती है।
६ - इच्छावाचक वाक्य     ==> काश! रोज़ी हिन्दी भी पढ़ लेती।
७ - संदेहवचक वाक्य      ==> संभव है रोज़ी हिन्दी भी पढ़ लेती।
८ - संकेतवाचक वाक्य    ==> यदि रोज़ी हिन्दी भी पढ़ लेती तो उसे यहाँ
                      आसानी होती। 

(च) - इच्छावाचक वाक्य का परिवर्तन ==>
 जैसे ==>           काश ! मैं भी पुस्तकालय में जाता ।
 
१ - विधानवाचक वाक्य    ==> मैं भी पुस्तकालय में जाता हूँ।
२ - आज्ञावाचक वाक्य     ==> मुझे भी पुस्तकालय में जाने दिया जाय।
३ - निषेधवाचक वाक्य     ==> मैं पुस्तकालय में भी नहीं जाता।
४ - प्रश्नवाचक वाक्य      ==> क्या मैं भी पुस्तकालय में जाऊँ?
५ - विस्मयादिवाचक वाक्य ==> आह ! मैं भी पुस्तकालय में जाता।
६ - इच्छावाचक वाक्य     ==> काश ! मैं भी पुस्तकालय में जाता।
७ - संदेहवचक वाक्य      ==> शायद मैं भी पुस्तकालय में जाता।
८ - संकेतवाचक वाक्य==> यदि मैं भी पुस्तकालय में जाता तो ज्ञानी बनता|


(छ) - संदेहवाचक वाक्य का परिवर्तन ==>
जैसे ==>               शायद आज पिताजी आएँगे।
१ - विधानवाचक वाक्य    ==> आज पिताजी आएँगे।
२ - आज्ञावाचक वाक्य     ==> पिताजी ! आज आ आइएगा।
३ - निषेधवाचक वाक्य     ==> आज पिताजी नहीं आएँगे।
४ - प्रश्नवाचक वाक्य      ==> क्या आज पिताजी आएँगे?
५ - विस्मयादिवाचक वाक्य ==> ओह..हो ! आज पिताजी आएँगे।
६ - इच्छावाचक वाक्य     ==> काश ! आज पिताजी आ जाते।
७ - संदेहवचक वाक्य      ==> संभव है आज पिताजी आ जाएँगे।
८ - संकेतवाचक वाक्य     ==> यदि आज पिताजी आएँगे तो हम घूमने जाएँगे।


(ज) - संकेतवाचक वाक्य का परिवर्तन ==> 



जैसे ==>           यदि वर्षा होती तो फ़सल भी होती।
 
१ - विधानवाचक वाक्य    ==> वर्षा होने पर फ़सल भी होती है।
२ - आज्ञावाचक वाक्य     ==> ओ वर्षा ! बरसो ताकि फ़सल भी हो।
३ - निषेधवाचक वाक्य     ==> वर्षा नहीं होने पर फ़सल भी नहीं होती है।
४ - प्रश्नवाचक वाक्य      ==> क्या वर्षा होने पर फ़सल भी होती है?
५ - विस्मयादिवाचक वाक्य ==> अच्छा ! वर्षा होने पर फ़सल भी होती है।
६ - इच्छावाचक वाक्य     ==> काश ! वर्षा होने पर फ़सल भी होती।
७ - संदेहवचक वाक्य      ==> संभव है वर्षा होती तो फ़सल भी होती।
८ - संकेतवाचक वाक्य     ==> यदि वर्षा होती तो फ़सल भी होती।

 
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॥ इति - शुभम् ॥
विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी’

 (ख) रचना के आधार पर वाक्य क्रमश : अगले पोस्ट में ==>==>
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Sunday, 1 March 2015

CBSE CLASS IX - HINDI VYAKARAN - ARTH KE ADHAR PAR VAKYA KE BHED (अर्थ के आधार पर वाक्य के भेद)

  
विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी’


वाक्य को दो आधारों पर बाँटा गया है ==>
(क) अर्थ के आधार पर
(ख) रचना के आधार पर
 

(क) अर्थ के आधार पर वाक्य के आठ भेद हैं ==>
१ - विधानवाचक वाक्य ।
२ - आज्ञावाचक वाक्य ।
३ - निषेधवाचक वाक्य ।
४ - प्रश्नवाचक वाक्य ।
५ - विस्मयादिवाचक वाक्य ।
६ - इच्छावाचक वाक्य ।
७ - संदेहवचक वाक्य ।
८ - संकेतवाचक वाक्य ।

१ - विधानवाचक वाक्य
==> जिस वाक्य में किसी क्रिया के होने की सूचना दी गई हो, वह विधानवाचक वाक्य कहलाता है।
जैसे ==> 

विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी’
चीनी मीठी होती है।       सूर्य पूरब से उगता है।      दूध उजला होता है।    राम अयोध्या के राजा थे।

२ - आज्ञावाचक वाक्य ==> जिस वाक्य में किसी को आज्ञा , आदेश दिया गया हो अथवा निवेदन या प्रार्थना की गई हो , वह आज्ञावाचक वाक्य कहलाता है।
 जैसे ==> 

विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी’  तुम बैठ जाओ।        कृपया खड़े हो जाइए।       कृपया आप सब शान्त रहें।    हे प्रभु ! रक्षा कीजिए।
   
 ३ - निषेधवाचक वाक्य ==> जिस वाक्य में किसी क्रिया के न होने का बोध हो , वह निषेधवाचक वाक्य कहलाता है।
 जैसे ==> 
विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी’
अंश विद्यालय नहीं जाएगा।   रात में बिजली नहीं रहती।   उसने बात तक नहीं की।   गोलू पाठ नहीं पढ़ता है।

४ - प्रश्नवाचक वाक्य
==> जिस वाक्य में किसी से कोई प्रश्न किया जाए , वह प्रश्नवाचक वाक्य कहलाता है।
 जैसे ==> 

विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी’  तुम्हारा नाम क्या है?   क्या आप रायगंज में रहते हैं?  आप क्या खाना पसंद करेंगे?  स्वास्थ्य अब कैसा है?

५ - विस्मयादिवाचक वाक्य
==> जिस वाक्य में विस्मय आदि के भाव प्रकट हों , वह विस्मयादिबोधक वाक्य कहलाता है।
जैसे ==> 

विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी’
  अरे! इतने बड़े हो गए।     अहा! क्या मौसम है।     धत्! मुँह नोच लूँगा ।   हाय! मैं तो डर ही गई।

६ - इच्छावाचक वाक्य
==> जिस वाक्य में किसी की मनोकामना ,मंगलकामना या आशीर्वाद प्रकट हो , वह इच्छावाचक वाक्य कहलाता है।
 जैसे ==> 

विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी’
  काश! मेरे भी पंख होते।    आपकी यात्रा मंगलमय हो।   ईश्वर तुम्हें दीर्घायु करे।    नव वर्ष की  बधाइयाँ।

७ - संदेहवचक वाक्य ==> जिस वाक्य में किसी कार्य के होने में संदेह हो , वह संदेहवाचक वाक्य कहलाता है।
 जैसे ==> 

विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी’
 संभव है आज धूप निकले।   संभवत: मैं जीत जाऊँ।  कदाचित् उसने देखा ही न हो। शायद उसे खबर ही न हो।

८ - संकेतवाचक वाक्य ==> जिस वाक्य में किसी एक क्रिया के होने पर ही दूसरी क्रिया के होने का संकेत हो , वह संकेतावाचक वाक्य कहलाता है।
जैसे ==> 

विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी’
     जब धूप निकलेगी , तब कपड़े धोएँगे ।           आप होते , तो इतनी परेशानी नहीं उठानी पड़ती।

विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी’

     यदि तुम बुलाते , तो मैं ज़रूर आता ।               अगर मन लगाकर पढ़ते , तो पास हो जाते।

 
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॥ इति - शुभम् ॥
विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी

अर्थ के आधार पर वाक्य-परिवर्तन क्रमश : अगले पोस्ट में ==>
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Saturday, 18 October 2014

HINDI GRAMMAR PRONOUN - HINDI VYAKARAN SARVANAM (हिन्दी व्याकरण सर्वनाम)

सर्वनाम


           1. अथर्व खेल कर आया , वह अब पढ़ेगा ।


2. रूद्र ने अपने दोस्तों से कहा , मैं भी पढूँगा।




इन वाक्यों में ‘वह’ और ‘मैं’ शब्द संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त हुए हैं। अतः ये सर्वनाम हैं। 

संज्ञा के स्थान पर प्रयोग किए जाने वाले शब्दों को सर्वनाम कहते हैं।

सर्वनाम के भेद :-
1. पुरुषवाचक सर्वनाम
2. निश्चयवाचक सर्वनाम
3. अनिश्चयवाचक सर्वनाम
4. प्रश्नवाचक सर्वनाम 
5. सम्बन्धवाचक सर्वनाम
6. निजवाचक सर्वनाम


1. पुरुषवाचक सर्वनाम :- जिस सर्वनाम का प्रयोग बोलने वाले , सुनने वाले या किसी अन्य के लिए होता है , उसे पुरुषवाचक सर्वनाम कहते हैं।
जैसे - मैं , तुम , वह आदि।


इस दृष्टि से पुरुषवाचक सर्वनाम के निम्नलिखित तीन भेद हैं :-

(क) उत्तम पुरूष :- जिस सर्वनाम का प्रयोग बोलने वाला या लिखने वाला अपने लिए करता है , उस सर्वनाम को उत्तम पुरुषवाचक सर्वनाम कहते हैं।
जैसे :-


               (अ) - मैं पत्र लिख रहा हूँ।  


(आ) - हमलोग रायगंज में रहते हैं।






(ख) मध्यम पुरूष :- बोलने वाला या लिखने वाला जिस सर्वनाम का प्रयोग सुनने वाले या पढ़ने वाले के लिए करता है , उस सर्वनाम को मध्यम पुरूषवाचक सर्वनाम कहते हैं। 

जैसे :-  (अ) - तुम उधर मत जाओ ?




(आ) - तुमलोग क्या खा रहे हो ?




(ग) - अन्य पुरूष :- बोलने वाले और सुनने वाले अपने या सामने वाले के अलावा अन्य तीसरे व्यक्ति के लिए जिस सर्वनाम का प्रयोग करते हैं ,उस सर्वनाम को अन्य पुरूषवाचक सर्वनाम कहते हैं।
जैसे - 


                                                                   (अ) - वह फल खाता है।



(आ) - वेलोग दिन भर खेलते हैं।



2. निश्चयवाचक सर्वनाम :- जो सर्वनाम किसी निश्चित वस्तु , व्यक्ति या घटना के लिए प्रयुक्त होते हैं , वे निश्चयवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।
जैसे- 

                    (अ) - वह मेरा भाई है।

(आ) - यह तुम्हारी कलम है।





3. अनिश्चयवाचक सर्वनाम :-  जो सर्वनाम किसी अनिश्चित वस्तु , अनिश्चित व्यक्ति या अनिश्चित घटना के लिए प्रयुक्त होते हैं , वे अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहलाते हैं। 
जैसे - 

 (अ) - कोई आ रहा है।
            (आ) - वहाँ कुछ चिपक गया है।


4. प्रश्नवाचक सर्वनाम :- जो सर्वनाम प्रश्न पूछने के लिए प्रयोग किया जाता है , उसे प्रश्नवाचक सर्वनाम कहते हैं।
जैसे :- 
(अ) - वहाँ कौन गाना गा रहा है ?
                       (आ) - तुम क्या खा रहे हो ?
5. सम्बन्धवाचक सर्वनाम :- जो सर्वनाम दो पदों के बीच सम्बन्ध जोड़ता है , उसे सम्बन्धवाचक सर्वनाम कहते हैं।
जैसे-

  (अ) - जिसकी लाठी , उसकी भैंस । 

     (आ) - जो सोता है , सो खोता है।




6. निजवाचक सर्वनाम :- वक्ता या लेखक जिस सर्वनाम का प्रयोग वाक्य में अपने लिए करता है , उसे निजवाचक सर्वनाम कहते हैं।
जैसे - 

(अ) - हमें अपना काम अपने आप करना चाहिए ।

                     
             (आ) - तुम अपना काम स्वयं करो। 



॥  इति शुभम्  ॥
विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी’