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Wednesday, 2 March 2016

MATI WALI (माटी वाली) CBSE CLASS 9 HINDI KRITIKA-1 CHAPTER-4 BY VIDYA SAGAR NOUTIYAL

 

माटी वाली 


प्रश्न १ - शहरवासी सिर्फ़ माटी वाली को ही नहीं उसके कंटर को भी अच्छी तरह पहचानते हैं। आपकी समझ से वे कौन से कारण रहे होंगे जिनके रहते माटी वाली को सब पहचानते थे?
उत्तर - माटी वाली अपने पति के साथ शहर से ३-४ किलोमीटर दूर रहती थी। परन्तु उसका पूरा समय टीहरी शहर में ही गुजरता था। टीहरी वासियों को अपना चूल्हा-चौका लीपने के लिए लाल माटी की जरूरत होती थी। शहर में लाल माटी पहुँचाने वाली केवल माटी वाली ही थी। वही शहर के प्रत्येक घर में माटी पहुँचाती थी। उस कार्य को करनेवाला कोई दूसरा नहीं था। अत: सभी लोग उसके ग्राहक थे। संभवत: बार-बार दिखने , मिलने या प्राय: घर में आने-जाने के कारण शहरवासी सिर्फ़ माटी वाली को ही नहीं उसके कंटर को भी अच्छी तरह पहचानते थे। 

प्रश्न २ - माटी वाली के पास अपने अच्छे या बुरे भाग्य के बारे में ज्यादा सोचने का समय क्यों नहीं था?
उत्तर - माटी वाली का जीवन संघर्षों से भरा था। उसके लिए दो वक़्त की जुटाना मुश्किल था। सुबह से शाम तक वह काम में लगी रहती थी । किन्तु ; संयोग से किसी दिन यदि वह काम न करती तो उसे भूखा ही सोना पड़ता था। जहाँ तक भाग्य की बात है तो कहा जा सकता है कि उसके भाग्य में काम करना ही लिखा था। आए दिन ज़िन्दगी के कड़वे सच का सामना करना पड़ता था। संभवत: यही कारण था कि उसके पास अपने अच्छे या बुरे भाग्य के बारे में ज्यादा सोचने का समय नहीं था।

प्रश्न ३ - ‘भूख मीठी कि भोजन मीठा’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर - ‘भूख मीठी कि भोजन मीठा’ वाक्य अर्थ की दृष्टि से प्रश्नवाचक वाक्य है, जिसका अभिप्राय है- ‘भूख’ और ‘स्वाद’ के बीच तुलना करके पाठक या श्रोता के मन में ‘भूख’ के महत्वपूर्ण होने की सूचना देना। तात्पर्य यह कि भूख लगने पर भोजन के स्वाद या उसकी मिठास की चिन्ता नहीं की जाती बल्कि पहले भूख मिटाने का उपाय ढूँढ़ा जाता है। भूख मिटाना पहली प्राथमिकता होती है, भोजन के स्वाद का स्थान बाद में आता है। पठित पाठ में माटी वाली चाय को ही साग की तरह बताती है, तब घर की मालकिन का यह कहना कि “भूख तो अपने आप में साग होती है बुढ़िया।” दिए गए वाक्य   ‘भूख मीठी कि भोजन मीठा’ के अभिप्राय को और अधिक स्पष्ट करता है।

प्रश्न ४ - “पुरखों की गाढ़ी कमाई से हासिल की गई चीजों को हराम के भाव बेचने को मेरा दिल गवाही नहीं देता।” मालकिन के इस कथन के आलोक में विरासत के बारे में अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर - हमारे पूर्व-पुरूषों द्वारा उपार्जित वे सभी चीजें जो हमें परम्परा से प्राप्त होती हैं, उन्हें विरासत कहा जाता है। निश्चित रूप से हमें अपनी विरासत की सुरक्षा और संरक्षा करनी चाहिए। विरासत एक ओर जहाँ पारम्परिक शिल्प , कला , कौशल और विज्ञान का अनूठा संग्रह होती है, वही अपनी भावी पीढ़ी के लिए कुछ करने या सोचने की प्रेरणा का स्रोत भी होती है। न जाने किन परिस्थियों में हमारे पूर्वजों ने एक-एक चीज़ इकट्ठा किया होगा और यत्नपूर्वक सहेजकर हमारे लिए रखा होगा। अत: उनके प्रति और अपनी विरासत के प्रति हमारे मन में आदर और श्रद्धा होनी चाहिए। परन्तु ध्यान रहे; विरासत के प्रति आदर और श्रद्धा रखने का तात्पर्य यह नहीं है कि उसे आदरणीय या पूजनीय मानकर उसका उपयोग ही न किया जाय। यह सरासर ग़लत है। वास्तव में विरासत का सदुपयोग ही उसके प्रति आदर और श्रद्धा का द्योतक है।

प्रश्न ५ - माटी वाली का रोटियों का इस तरह हिसाब लगाना उसकी किस मज़बूरी को प्रकट करता है?
उत्तर - रोटी कोई ऐसी चीज़ नहीं होती जिसे भविष्य के लिए संचित किया जा सके अथवा किसी बैंक में जमा किया जा सके। अभिप्राय यह कि आज की बनी रोटी आज ही खायी जाती है। रोटियों की गिनती तब की जाती है जब यह जानना हो कि आवश्यकता के अनुसार रोटियाँ हैं या नहीं? 
माटी वाली को माटी देने के बदले रोटियाँ भी मिलती थीं, जिससे वह अपना तथा अपने बूढ़े एवम् अशक्त पति का पेट भरती थी। माटी वाली का रोटियों का इस तरह हिसाब लगाना जहाँ एक ओर यह सिद्ध करता है कि उसके समस्त क्रिया-कलाप के केंद्र में वे रोटियाँ ही हैं वहीं दूसरी ओर उसकी ग़रीबी, बेबसी और लाचारी का व्यंजक भी है।

प्रश्न ६- आज माटी वाली बुड्ढे को कोरी रोटियाँ नहीं देगी-- इस कथन के आधार पर माटी वाली के हृदय के भावों को अपने शब्दों में लिखिए। 
उत्तर - माटी वाली अपने अशक्त पति का इस तरह ध्यान रखती थी जैसे किसी बच्चे का रखना पड़ता है। अशक्त पति के भरण-पोषण की जिम्मेदारी ने माटी वाली को कर्मठ , जिम्मेदार और परिश्रमी बना दिया। पति की हालत पर उसे दुख होता है, वह अपने को बेहद लाचार और मज़बूर महसूस करती है। किन्तु , वह अपनी बेबसी से पति को दुखी नहीं करना चाहती। अपने पति के लिए उसके मन में प्रेम, दया और करूणा भरी पड़ी थी। पति के चेहरे पर खुशी देखकर उसे तसल्ली मिलती थी। वह जानती थी कि उसका पति अधिक दिनों का मेहमान नहीं है। अत: वह अपने पति को अधिक से अधिक खुशियाँ  देना चाहती थी। इसके लिए उसे दिन-दिन भर काम करना करना पड़ता था। उसे पता था कि उस ग़रीब को दो वक़्त की रोटी मिल जाय तो उसके खुशी का ठिकाना नहीं रहता। मात्र इतनी उपलब्धि ही बुड्ढे के आनन्द का कारण बन जाती है। अपने बुड्ढे के चेहरे पर आने वाली उस खुशी को बरकरार रखना ही उस माटी वाली बुढिया ने अपना लक्ष्य बना लिया था।

प्रश्न ७ - “ग़रीब आदमी का श्मशान नहीं उजाड़ना चाहिए।” इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर - माटी वाली के पास ‘अपना’ कहने के लिए मात्र वह झोपड़ी ही थी। उसकी पूरी दुनिया उस झोपड़ी में ही समायी थी। उसी में उसने जीने-मरने के सपने देखे थे। टिहरी बाँध बनने के कारण पूरा गाँव विस्थापित होकर अन्यत्र जा रहा था। उसे भी झोपड़ी छोड़कर कहीं और चले जाने का निर्देश मिल चुका था। अपनी पूरी ज़िन्दगी झोपड़ी में गुज़ारने के बाद वह उसी झोपड़ी में मरना भी चाहती थी। सारा गाँव उजड़ कर जा रहा था पर; बेचारी माटीवाली भला कहाँ जाती। अत: वह ग़रीब और बेसहारा झोपड़ी के बाहर बैठी सबसे गुहार लगा रही थी - ‘ग़रीब आदमी का श्मशान नहीं उजाड़ना चाहिए।’    


॥ इति शुभम् ॥



विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी’



Sunday, 14 February 2016

cbse class 9 hindi kritika - kis tarah aakhirkar main hindi me aayaa - shamsher bahadur singh ( किस तरह आखिरकार मैं हिन्दी में आया-शमशेर बहादुर सिंह )

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किस तरह आखिरकार मैं हिन्दी में आया


प्रश्न १ - वह ऐसी कौन सी बात रही होगी जिसने लेखक को दिल्ली जाने के लिए बाध्य कर दिया?
उत्तर - लेखक स्वाभिमानी थे। संभवत: उनके निठल्लेपन पर किसी घर वाले या उनके अपने ने व्यंग्य किया होगा। बात उनके हृदय में चुभ गई होगी। शायद ऐसी ही आहत अवस्था में उन्होंने निर्णय किया होगा कि अब उन्हें कोई रोजी-रोजगार अवश्य करना चाहिए। दिल्ली क्योंकि राजधानी है अत: उन्होंने अपने कर्म-क्षेत्र के रूप में उसे ही चुना और जो कुछ भी दो-चार रुपए उनके पास थे उसे लेकर आनन-फ़ानन में जो भी पहली बस मिली उससे दिल्ली के लिए रवाना हो गए।

प्रश्न २- लेखक को अंग्रेजी में कविता लिखने पर अफ़सोस क्यों रहा होगा?
उत्तर - भारत गाँवों का देश है। यहाँ की अधिकांश आबादी गाँवों में ही रहती है। गाँव में प्राय: लोग अपनी क्षेत्रीय बोली बोलते हैं। आवश्यकता पड़ने पर हिन्दी का भी प्रयोग करते हैं। अंग्रेजी विदेशी या साहबों की भाषा होने के कारण उससे न तो गाँव वालों का कोई लेना - देना रहता है और न समझ में ही आती है। शायद इसी सचाई को जानने के बाद कि उनकी कविता आम भारतीयों तक नहीं पहुँच पाती, लेखक को अंग्रेजी में कविता लिखने पर अफ़सोस ही नहीं बल्कि बहुत अफ़सोस हुआ होगा।

प्रश्न ३- अपनी कल्पना से लिखिए कि बच्चन ने लेखक के लिए ‘नोट’ में क्या लिखा होगा?
उत्तर - बच्चन ने लेखक के लिए कुछ इस प्रकार का ‘नोट’ लिखा होगा---
प्रिय शमशेर!
अपने बड़े भाई तेज़ बहादूर के दोस्त ब्रजमोहन जी को तो जानते ही होगे। उन्हीं के कहने पर मैं तुमसे मिलने आया था , पर दुर्भाग्यवश मुलाकात न हो सकी। सोचा था मैं शायद तुम्हारी कोई सहायता कर सकूँ। खैर! यहाँ आकर मैं जितना तुम्हारे बारे में सुना; मुझे अच्छा ही लगा। मन लगाओगे तो बहुत आगे जाओगे। यदि कुछ और करना चाहते हो या किसी प्रकार की सहायता की ज़रूरत हो तो बेहिचक पत्र के माध्यम से सूचित करना। संभव है मैं किसी काम आ सकूँ। 
तुम्हारा शुभचिन्तक
बच्चन

प्रश्न ४ - लेखक ने बच्चन के व्यक्तित्व के किन-किन रूपों को उभारा है?
उत्तर -  लेखक ने बच्चन के व्यक्तित्व के कई रूपों को उभारा है, जिनमें निम्नलिखित रूप प्रमुख हैं :--

* भावुक :- बच्चन जी कोमल हृदय वाले व्यक्ति थे। उनसे किसी का भी दुख नहीं देखा जाता था। लेखक की सहायता करना इसका साक्षात् प्रमाण है। उनकी भावुकता ‘प्रबल झंझावात साथी’ जैसी रचना में देखी जा सकती है।

*सहृदय :- बच्चन जी का हृदय उदारता से भरा था। स्वयं पीड़ा और कष्ट में होने के बाद भी वे दूसरों के कष्ट दूर करने के लिए तत्पर रहते थे। सर्वथा अनजान लेखक के प्रति उन्होने जो किया वह उनकी सहृदयता का प्रमाण है।

*कला-पारखी :- बच्चन जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे । दवा दुकान में काम करनेवाले और अपने अतीत में पेंटिंग और चित्रकला से जुड़े रहने वाले लेखक के भीतर छुपे साहित्यकार को उन्होंने सहज ही पहचान लिया था और कालान्तर में  प्रयत्नपूर्वक उस साहित्यकार को सबके सम्मुख ला खड़ा किया।

* प्रेरणा के स्रोत :- बच्चन जी वाणी के धनी थे । उनका स्वभाव संघर्षशील, संकल्प फ़ौलादी और व्यवहार छल-प्रपंच रहित था। वे सहज ही सामने वाले पर अपना प्रभाव छोड़ देते थे।

*समय के पाबंद :- बच्चन जी समय के पक्के पाबंद थे । वे कहीं भी निश्चित समय पर पहुँचते थे। वर्षा के समय अपना सामान कंधे पर लेकर स्टेशन तक पैदल जाना और गंतव्य पर समय से पहुँचना इस बात का प्रमाण है।

प्रश्न ५ - बच्चन के अतिरिक्त लेखक को किन लोगों का तथा किस प्रकार का सहयोग मिला?
उत्तर -  बच्चन के अतिरिक्त लेखक को अन्य कई लोगों का  सहयोग प्राप्त हुआ, जिनमें प्रमुखतया उनके भाई तेज़बहादुर थे जिन्होंने पैसे से मदद किया। उनके ससुराल वालों ने उनकी रोज़ी के लिए एक केमिस्ट की दुकान पर रखवाया ताकि वे कंपाउंडरी सीख कर वे अपना गुज़ारा कर सके। पंत और निराला ने उन्हें लेखन के क्षेत्र में सहायता किया। बच्चन जी ने अभिभावक बनकर उनकी पढ़ाई आदि का खर्च उठाया।

प्रश्न ६ - लेखक के हिन्दी - लेखन में कदम रखने का क्रमानुसार वर्णन कीजिए।
उत्तर - इलाहाबाद में बच्चन जी के सानिध्य के कारण अनायास ही साहित्यिक वातावरण मिल गया था। निराला और पंत जैसे हिन्दी साहित्य के धुरंधरों से परिचय हुआ और क्रमश: प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। लेखक ने प्रोत्साहन पाकर कई निबंध भी लिखे जो ‘सरस्वती’ या ‘चाँद’ जैसी प्रसिद्ध पत्रिका में छपे भी। बच्चन जी ने एक नए प्रकार का ‘स्टैंज़ा’ लिखकर दिया, जिसका अनुसरण कर लेखक ने भी लिखा। जब वह रचना ‘हंस’ पत्रिका में छ्पी तब उसने सबका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। फिर निराला की अनुशंसा पर ‘रूपाभ’ के कार्यालय में प्रशिक्षण प्राप्त कर लेखक ‘हंस’ के कार्यालय में आधिकारिक रूप से चला गया। इस प्रकार लेखक ने पूर्ण रूप से हिन्दी - क्षेत्र में पदार्पण किया।

प्रश्न ७ - लेखक ने अपने जीवन में जिन कठिनाइयों को झेला है , उनके बारे में लिखिए।
उत्तर - लेखक ने अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना किया। आरंभ में बेकार रहने के कारण उसके पास धन का अभाव था। फलत: व्यंग्य आदि का भी सामना करना पड़ा। इसी दौरान पत्नी को टीबी.(तपेदिक) जैसा रोग हो गया। आर्थिक अभाव के कारण समुचित इलाज़ न करवाने से पत्नी की मृत्यु हो गई। बड़ी कठिनाई से ‘आर्ट-स्कूल’ में प्रवेश पाया। पेंटिंग करके मकान का किराया और अपना खर्च उठाता रहा। कंपाउंडरी सीखने के लिए ससुराल वालों का कृपा-पात्र बनना पड़ा। फिर बच्चन जी की दया पर इलाहाबाद में रहकर उसे अपनी पढ़ाई पूरी करनी पड़ी। हिन्दी के क्षेत्र में आने के लिए भी उसे कठिन परिश्रम करना पड़ा। इस प्रकार कहा जा सकता है कि लेखक ने अपने जीवन में ढेर सारी कठिनाइयों का सामना किया।

॥इति-शुभम्॥

अगला पाठ क्रमश: अगले पोस्ट में....
विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी’

Tuesday, 24 November 2015

REEDH KI HADDI - CBSE CLASS 9 HINDI KRITIKA - RIDH KI HADDI BY JAGDISH CHANDRA MATHUR (सी.बी.एस.ई. कक्षा नौवीं हिन्दी कृतिका भाग - 1- रीढ़ की हड्डी - लेखक जगदीश चंद्र माथुर)

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 रीढ़ की हड्डी
प्रश्न 1-  रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद बात-बात पर "एक हमारा जमाना था ...."कहकर अपने समय की तुलना वर्तमान समय से करते हैं। इस प्रकार की तुलना करना कहाँ तक तर्कसंगत है?
उत्तर- समय परिवर्तनशील हुआ करता है । अत: उसकी मानसिकता , विचारधारा और रहन-सहन में बदलाव आना स्वाभाविक है। वर्तमान में जो परिवर्तन दिखाई दे रहा है वह समयानुकूल ही है। रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद का अपने समय की तुलना वर्तमान समय से करना बिल्कुल तर्कसंगत नहीं है क्योंकि सामाजिक , आर्थिक , सांस्कृतिक या अन्य क्षेत्रों में आए बदलाव समय सापेक्ष ही होते हैं। ऐसे में "एक हमारा जमाना था ...." कहकर अपने जमाने को श्रेष्ठ साबित करना और वर्तमान को गया-गुजरा या अविकसित कहना परोक्ष रूप से वर्तमान पीढ़ी को अपमानित करना है। ऐसी ही तुलना के क्रम में उस ज़माने को यदि आज का युवक गया-गुजरा कह दे तो उसे असभ्य , अव्यवहारिक और न जाने कैसे - कैसे विशेषणों से नवाजा जाता है। हमारा प्रयास होना चाहिए कि ऐसी नौबत ही न आए। ऐसे लोगों को यदि दूसरों की भावनाओं का नहीं तो कम से कम अपने मान-सम्मान की चिन्ता अवश्य करनी चाहिए। 

प्रश्न 2- रामस्वरूप का अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलवाना और विवाह के लिए छिपाना, यह विरोधाभास उनकी किस विवशता को उजागर करता है?
उत्तर- रामस्वरूप ने अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलवाई। यह उनके आधुनिकता के समर्थक होने का प्रमाण है। वे अपनी बेटी का विवाह गोपालप्रसाद के बेटे से करवाना चाहते थे, जबकि दकियानूसी विचारवाले गोपालप्रसाद उच्च शिक्षित बहू नहीं चाहते थे। इसलिए रामस्वरूप बाबू को विवशतावश अपनी बेटी की उच्च शिक्षा की बात को छिपाना पड़ा। यह एक विरोधाभास ही सही पर वास्तव में यह उनकी विवशता को उजागर करता है कि आधुनिक समाज में सभ्य नागरिक होने के बावजूद उन्हें अपनी बेटी के भविष्य की खातिर रूढ़िवादी लोगों के दवाब में झुकना पड़ रहा था। 

प्रश्न 3- अपनी बेटी का रिश्ता तय करने के लिए रामस्वरूप उमा से जिस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा कर रहे हैं,वह उचित क्यों नहीं है ?
उत्तर- रामस्वरूप का अपनी बेटी उमा से अपेक्षित व्यवहार सरासर गलत है। वे अपनी पढ़ी-लिखी बेटी को कम पढ़ा-लिखा साबित करना चाहते हैं,जो कि बिल्कुल अनुचित है। साथ ही वे उमा की सुन्दरता को और भी बढ़ाने के लिए नकली प्रसाधन सामग्री को उपयोग करने की बात कर रहे हैं। वे चाहतें है कि उमा का व्यवहार लड़के और उसके पिता जैसा चाहते हैं वैसा हो। वह यह बात भूल रहें हैं कि लड़के की तरह लड़की की भी पसंद है,जिसका ध्यान रखना चाहिए।

प्रश्न 4- गोपाल प्रसाद विवाह को 'बिजनेस' मानते हैं और रामस्वरूप अपनी बेटी की उच्च शिक्षा छिपाते हैं ,क्या आप मानते हैं कि दोनों ही समान रूप से अपराधी हैं ? अपने विचार लिखिए।
उत्तर- मेरे विचार से दोनों ही समान रूप से अपराधी हैं।लड़के के पिता गोपाल प्रसाद विवाह जैसे पवित्र रिश्ते में भी बिजनेस ढूँढ़ रहे हैं। जबकि लड़की के पिता रामस्वरूप आधुनिक समाज में सभ्य नागरिक होने के बावजूद रूढ़िवादी लोगों का साथ दे रहें हैं। यदि वे चाहते तो अपनी बेटी के लिए किसी अन्य सभ्य और स्वाभिमानी वर की तलाश करते। ऐसा करके वे दोनों ही संबंधों की गरिमा को कम कर रहे हैं।
अत: मेरे विचार से दोनों ही समान रूप से अपराधी हैं। 

प्रश्न 5- "...आपके लाड़ले बेटे के की रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं...."उमा इस कथन के माध्यम से शंकर की किन कमियों की ओर संकेत करना चाहती है?
उत्तर- शंकर परजीवी , परमुखापेक्षी और पराश्रित जीवन जीने वाला लड़का है।उसको अपने मान-सम्मान की परवाह भी नहीं है। लड़कियों के हॉस्टल का चक्कर काटते हुए जब उसे पकड़ा गया तब उसने हॉस्टल की नौकरानी के पैर पकड़ लिए। उमा को पसन्द करने के क्रम में पिता की हाँ में हाँ और ना में ना मिला रहा था।उसने अपने पिता के दकियानूसी विचार और व्यवहार का ज़रा भी विरोध नहीं किया। उमा की पढ़ाई-लिखाई की बात जानकर वह अपने पिता के साथ तुरंत वापस जाने को तत्पर हो जाता है। इससे ऐसा लगता है जैसे शंकर का अपना कोई व्यक्तित्व ही न हो। उसके इसी वयक्तित्व हीनता को लक्ष्य करके उमा ने कहा कि “घर जाकर देखिए कि आपके लाड़ले बेटे के की रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं....।”

प्रश्न 6-  शंकर जैसे लड़के या उमा जैसी लड़की - समाज को कैसे व्यक्तित्व की जरूरत है ? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर- शंकर जैसे लड़के जहाँ एक ओर समाज को पंगु बनाते हैं वहीं दूसरी ओर अपने साथ - साथ समाज को भी पतन की ओर धकेलते हैं। समाज को आज उमा जैसे व्यक्तित्व की तलाश है । आज समाज में उसके जैसी साहसी , शिक्षित , सभ्य , स्पष्टवक्ता लड़की की ही आवश्यकता है। ऐसी लड़कियाँ ही समाज के तथाकथित रहनुमाओं का भांडाफोड़ करके उनको असलियत का आईना दिखा सकती हैं । निश्चित रूप से समाज को उमा जैसी क्रान्तिकारी लड़की ही चाहिए जो समाज को एक नई दिशा प्रदान कर सके।

प्रश्न 7- 'रीढ़ की हड्डी' शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- 'रीढ़ की हड्डी' एकांकी का शीर्षक प्रतीकात्मक है । शरीर में 'रीढ़ की हड्डी' शरीर को सीधा रखती है। जिनके शरीर में रीढ़ की हड्डी नहीं होती , वे सीधे खड़े भी नहीं हो सकते। शंकर की बौद्धिक चारित्रिक एवं शारीरिक अयोग्यता के कारण ही उमा ने इसे बिना रीढ़ की हड्डी वाला कहा है। शंकर जैसे युवक  चरित्रहीन , परजीवी और सारी उम्र दूसरों के इशारों पर ही चलते हैं फलत: ये समाज पर बोझ होते हैं। यही स्थिति समाज की भी है। गोपाल प्रसाद जैसे घटिया या दकियानूसी - विचार तथा आत्म-केन्द्रित व्यक्तियों को प्रश्रय देनेवाली सामाजिक व्यवस्था भी लचर और असंतुलित है। ऐसे समाज को भी ‘बिना रीढ़ की हड्डी वाला समाज’ कहा जा सकता है। इस प्रकार दोहरा अर्थ रखने वाला ‘शीर्षक’ सर्वथा उपयुक्त और सार्थक है।

प्रश्न 8- कथा वस्तु के आधार पर आप किसे एकांकी का मुख्य पात्र मानते हैं और क्यों ?
उत्तर- कथा वस्तु के आधार पर हम कह सकते हैं कि पुरूष पात्रों में गोपाल प्रसाद मुख्य है जबकि स्त्री पात्र में उमा का चरित्र है। दोनों में महत्व और प्रधानता की बात आती है, तो मुझे उमा ही एकांकी का मुख्य पात्र लगती है। भले ही एकांकी में वह थोड़े समय के लिए आई है परन्तु ; एकांकी का उद्देश्य और संदेश उमा के द्वारा ही पाठकों या दर्शकों तक पहुँचता है। एकांकीकार ने कथानक का ताना - बाना उमा के चरित्र को केन्द्र मे रखकर ही बुना है। माथुर जी ने अपनी बातों या विचारों को उमा के चरित्र के माध्यम से ही अभिव्यक्त किया है। उमा के चरित्र के इर्द-गिर्द ही सारी कहानी घूमती है , उसके अभाव में कहानी अधूरी ही रह जाती। अत: हम कह सकते हैं कि एकांकी में उमा का चरित्र ही मुख्य है।

प्रश्न 9 - एकांकी के आधार पर रामस्वरूप और गोपालप्रसाद की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए।
उत्तर- रामस्वरूप एक साधारण व्यक्ति हैं। वे सामाजिक समरसता भी चाहते हैं।उनके मन में न तो पुरूष होने का दंभ है और न स्त्रियों के प्रति कोई हीन भावना। आधुनिक होने के कारण वे शिक्षा को सबके लिए आवश्यक समझते हैं।सामाजिक रूढ़ियों और परंपराओं को धता बताकर उन्होंने अपनी बेटी उमा को ऊँची शिक्षा दिलवाई। परन्तु उनमें दृढ़ इच्छाशक्ति , आत्मविश्वास और सामाजिक कुरीतियों अथवा मान्यताओं का विरोध करने की क्षमता का अभाव है। फलत: उनका चरित्र एक बेचारा और लाचार व्यक्ति जैसा दिखता है।
गोपाल प्रसाद धूर्त किस्म का व्यक्ति है। वह स्वभाव से स्वार्थी और लालची है। वकील होने के कारण आज के समाज में शिक्षा के महत्व को वह भी जानता है। वह भी आधुनिकता से परिचित तो है किन्तु उसके विचार दकियानूसी , रूढ़ियों से ग्रस्त और पारंपरिक हैं। स्त्रियों के लिए उसके मन में इज्ज़त नहीं है। वह स्त्री-पुरुष की समानता का घोर विरोधी है। वह विवाह जैसे बंधन को बिज़नेस मानता है।

प्रश्न 10 - ‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी का उद्देश्य क्या है?
उत्तर -  ‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी जगदीशचंद्र माथुर जी के ‘भोर का तारा’ शीर्षक संकलन से संकलित है। इस एकांकी का उद्देश्य समाज की उस घृणित मनोवृत्ति का पर्दाफ़ाश करना है जो स्त्रियों को पुरूषों की तुलना में कुछ समझती ही नहीं अथवा एकदम नीचले स्तर का मानती है। पुरूषों की पक्षपाती समाज-व्यवस्था में शादी-विवाह के अवसर पर वैवाहिक संबंध तय करते समय लड़कियों के साथ पशुवत् व्यवहार किया जाता है। उनका इस प्रकार निरीक्षण , जाँच या तोल-मोल किया जाता है, जैसे वे कोई बेजान-वस्तु या बेज़ुबान-पशु हों। प्रस्तुत एकांकी एक ओर जहाँ लड़का-लड़की के भेदभाव से ग्रसित समाज को आईना दिखाकर उसकी दूषित मनोवृत्ति पर कुठाराघात करती है; वहीं दूसरी ओर लड़कियों की स्वतंत्रता का परचम बुलंद करती है। उनके हक़ की गूँज को गर्जना में परिवर्तित करने की कोशिश करती है। साथ ही पूरे समाज को स्त्रियों के हक़ और अधिकार प्रदान कर उनकी दशा और दिशा को विकासोन्मुख करने का संदेश दिया है। 


प्रश्न 11 - समाज में महिलाओं को उचित गरिमा दिलाने हेतु आप कौन - कौन से प्रयास कर सकते हैं? 
उत्तर - हम समाज में महिलाओं को उचित गरिमा दिलाने के लिए निम्नलिखित प्रयास कर सकते हैं :- 
(क) - सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं को उचित सम्मान देकर ।
(ख) - अच्छे कार्य करनेवाली महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर कार्यक्रम के           माध्यम से उनको सम्मानित करके।
(ग) - समाज में स्त्री शिक्षा के महत्व को प्रचारित करके।
(घ) - दहेज - प्रथा का विरोध एवं बिना दहेज की शादी का समर्थन करके।
(ङ) - रुचि के अनुसार किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करके।
(च) - शादी - विवाह के अवसर पर लड़की के पसंद-नापसंद को महत्व देकर।
(छ) - सामाजिक समरसता , समानता , सांवैधानिक कर्तव्य और अधिकार की         बातें बताकर
(ज) - अशिक्षित महिलाओं के बीच समाज की सफल महिलाओं के उदाहरण प्रस्तुत       करके उनके मन में भी शिक्षा के प्रति रुचि जागृत करके।
                  ॥ इति - शुभम् ॥