Wednesday, 11 February 2015

CBSE CLASS X HINDI RAM LAXMAN PARASHURAM SAMVAD (राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद)


राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

प्रश्न १- परशुराम के क्रोध करने पर लक्ष्मण ने धनुष के टूट जाने के लिए कौन-कौन से तर्क दिए ?
उत्तर - धनुष के टूट जाने पर जब परशुराम क्रोध करने लगे तब लक्ष्मण ने तर्क देते हुए कहा कि बचपन से अब तक हमने न जाने कितनी धनुहियाँ तोड़ी हैं,किन्तु हम पर किसी ने क्रोध नहीं किया। हमारे लिए तो सभी धनुष एक समान है, एक धनुष के टूट जाने से किसी विशेष हानि की बात समझ में नहीं आती। वैसे भी श्रीराम ने इसे नया धनुष समझ के उठाया था,किन्तु यह तो छूते ही टूट गया।इसमें श्रीराम का कोई दोष नहीं है।

प्रश्न २ -  परशुराम के क्रोध करने पर राम और लक्ष्मण की जो प्रतिक्रियाएँ हुईं उनके आधार पर दोनों के स्वभाव की विशेषताएँ अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर -  परशुराम के क्रोध करने पर श्रीराम ने विनम्रता का परिचय दिया। उनके स्वर में परशुराम जी के लिए श्रद्धा और आदर-सम्मान झलक रहा था। परशुराम के क्रुद्ध एवं तीखे वचनों को सुनकर भी श्रीराम ने अपना धैर्य ,शील और वाणी की मधुरता बनाए रखा।और अंतत: परशुराम के क्रोध को शांत कर दिया जबकि ठीक इसके विपरीत लक्ष्मण ने उनके साथ ढीठाई दिखाई। उनका स्वभाव उग्रतर होता गया। उन्होंने परशुराम पर तीखे व्यंग्य किए और उनका उपहास भी किया। उन्होंने ठीक परशुराम के तुल्य व्यवहार करते हुए ईंट का जवाब पत्थर से दिया।

प्रश्न ३- लक्ष्मण और परशुराम के संवाद का जो अंश आपको सबसे अच्छा लगा उसे अपने श्ब्दों में संवाद शैली में लिखिए।
उत्तर- मुझे लक्ष्मण-परशुराम संवाद का निम्नलिखित अंश सबसे अच्छा लगा-
  लक्ष्मण : (व्यंग्य से) हे मुनि! आपके हाव-भाव से तो ऐसा लगता है मानो मृत्यु आपके वश में है, और आपके बुलाने से मुझे अपना शिकार बना लेगी।
 परशुराम : (परशु पकड़ते हुए) हे सभा में उपस्थित लोगों! अब मुझे दोष मत देना कि मैंने एक बालक को मार डाला। यह कटुवादी बालक मार डालने योग्य ही है।
 विश्वामित्र : (हाथ जोड़कर) हे ऋषि वर ! आप तो साधु हैं। साधुजन बालकों के गुण-दोष नहीं देखते। उनके अपराधों को क्षमा कर देते हैं।
 
परशुराम : (क्रोध से हाँफ़ते हुए) हे कौशिक! यह जानते हुए भी कि यह गुरू द्रोही है,इसने अपराध किया है फिर भी; इसे केवल आपके प्रेम और सद्भाव के कारण छोड़ रहा हूँ अन्यथा आप जानते हैं मुझे। 
लक्ष्मण : (हँसते हुए) आपके बारे में भला कौन नहीं जानता। आप माता-पिता के ऋण से मुक्त हो चुके हैं परन्तु गुरू-ऋण नहीं चुकाने का आपको बड़ा दुख है,शायद आप मुझे मारकर अपना गुरू-ऋण चुकाना चाहते हैं। यदि आप इतना ही असमर्थ हैं तो मुझे कहिए- मैं आपका गुरू-ऋण चुका दूँगा। 
(इस बात पर परशुराम ने पुन: अपना परशु उठा लिया)

प्रश्न ४- परशुराम ने अपने विषय में सभा को क्या-क्या कहा,इस चौपाई के आधार पर लिखिए-
          बाल ब्रह्मचारी अति कोही । बिस्वबिदित  क्षत्रियकुल  द्रोही ॥
          भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही।बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही॥
          सहसबाहु  भुज  छेदनिहारा । परसु   बिलोकु  महीपकुमारा ॥
             मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर ।
             गर्भन्ह के अर्भक दलन  परसु मोर  अति  घोर ॥

उत्तर- प्रस्तुत पद्यांश में परशुराम जी ने पूरी सभा के सामने अपने बारे में निम्नलिखित बातें बताई-
मैं बाल ब्रह्मचारी तथा अत्यंत क्रोधी हूँ। समूचा संसार यह जानता है कि मैं क्षत्रियकुल का शत्रु हूँ। मैंने अपनी इन्हीं भुजाओं के बल पर इस धरती को क्षत्रिय राजाओं से हीन किया है और उनके राज्यों को जीतकर ब्राह्मणों को दान कर दिया है। ऐ राजकुमार! मेरे इस परशु को देखो इसी से मैंने सहस्रबाहु जैसे शक्तिशाली राजा को भी मार डाला है। मेरा यह परसु इतना निर्मम है कि गर्भ में पल रहे शिशु पर भी दया नहीं करता।अत:ऐ राजकुमार! तुम मुझे क्रोधित कर के अपने माता-पिता को शोक-सागर में डूबने को विवश मत करो।


प्रश्न ५- लक्ष्मण ने वीर योद्धा की क्या-क्या विशेषताएँ बताई?
उत्तर-  लक्ष्मण ने वीर योद्धा की विशेषताएँ बताते हुए कहा कि जो शूरवीर होते हैं वे न तो अपनी प्रशंसा करते हैं और न बड़ी-बड़ी डींगें हाँकते हैं। युद्ध भूमि में वे अपने रण-कौशल का प्रदर्शन कर अपनी वीरता का परिचय देते हैं। व्यर्थ में बातें या गाली-गलौज नहीं करते।

प्रश्न ६ - साहस और शक्ति के साथ यदि विनम्रता हो तो बेहतर है। इस कथन पर अपने विचार लिखिए।
उत्तर - साहस और शक्ति के बिना सफल एवम् सुखद जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। व्यक्ति इन्हीं की बदौलत जीवन की कठिनाइयों का सामना करता है।परन्तु; यह भी सच है कि हर जगह साहस और शक्ति से काम नहीं चलता।कतिपय जगहों पर ये गुण तभी कारगर होते हैं, जब उनमें विनम्रता का भी पुट हो।विनम्रता के अभाव में कभी-कभी ये व्यक्ति को अहंकारी बना देते हैं,तब उसे अच्छे-बुरे की पहचान नहीं रह जाती।प्रतिकूल और आवेशमय परिस्थितियों में व्यक्तिशिष्टाचार और लोक-मर्यादा भूलाकर दूसरों का अपमान करने लगता है।अत: विनम्रता का होना बड़ी आवश्यक है। साहस और शक्ति के साथ यदि विनम्रता भी शामिल हो तो फ़िर सामर्थ्यवान् के सामर्थ्य का क्या कहना।

प्रश्न ७ -भाव स्पष्ट करें :-
(क) बिहसि लखनु बोले मृदु बानी । अहि मुनीसु महाभट मानी ॥
    पुनि - पुनि मोहे देखाव कुठारु। चहत उड़ावन फूँकि पहारु ॥

उत्तर - प्रस्तुत पद्यांश में परशुराम जी पर व्यंग्य करते हुए लक्ष्मण ने कहा है कि माना कि आप एक योद्धा हैं । परन्तु,मेरे जैसे शत्रु को केवल क्रोध करके या बार-बार परशु दिखा या चमका कर नहीम डराया जा सकता। आप मुझे कोई तुच्छ प्राणी समझकर  डरा-धमकाकर दबा देना चाहते हैं।आपका यह प्रयास ठीक वैसा ही उपहास्य है,जैसे कोई फूँक मारकर पहाड़ को उड़ाना चाहता हो।

 
(ख) इहाँ कुम्हड़बतिआ कोउ नाहीं।जे तरजनी देखि मरि जाहीं॥
    देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना॥

उत्तर - प्रस्तुत पद्यांश में परशुराम जी का उपहास करते हुए लक्ष्मण ने कहा है- हम कोई कुम्हड़े का बतिआ (निकलता हुआ काशी फल)नहीं हैं, जो तर्जनी अंगुली देख कर मुरझा जाता है।तात्पर्य यह कि हम भी वीर योद्धा हैं।आप हमें डरा-धमकाकर या क्रोध दिखाकर दबाने या चुप कराने की कोशिश मत कीजिए।वे लोग और होते हैं जो सामने वाले के क्रोध को देख कर निस्तेज हो जाते हैं।आप मेरे साथ वीरोचित व्यवहार कीजिए।

(ग) गाधिसूनु कह हृदय हसि मुनिहि हरियरे सूझ ।
    अयमय खाँड़ न ऊख्मय अजहुँ न बूझ अबूझ ॥

उत्तर - प्रस्तुत पद्याश में परशुराम जी के प्रति विश्वामित्र जी के मन में उमड़ने-घुमड़ने वाले मनोभावों का चित्रण है।विश्वामित्र जी सोचते हैं कि जैसे सावन के अंधे व्यक्ति को अपने आस-पास हमेशा हरे-भरे वातावरण का ही अहसास होता है,ठीक वैसे ही कई योद्धाओं को पराजित करने के कारण परशुराम जी विजय के मद में चूर हो गए हैं।तभी तो राम और लक्ष्मण जैसे ताक़तवर योद्धाओं को भी वे साधारण,तुच्छ और निर्बल समझ रहे हैं।उन्हे इस बात का ज्ञान क्यों नहीं हो रहा कि जिन्हें वे गुड़ की भेली समझ रहे हैं,वास्तव में वे लोहे के गोले हैं।

प्रश्न ८- पाठ के आधार पर तुलसी के भाषा सौन्दर्य पर दस पंक्तियाँ लिखिए।
उत्तर - तुलसीदास जी अवधी भाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं।उनकी सर्वोत्तम रचना रामचरितमानस है।प्रस्तुत पाठ रामचरित्मानस से ही उद्धृत है।इसकी काव्य भाषा अवधी है तथा दोहा और चौपाई जैसे गेय छंद का प्रयोग है।
तुलसीदास की भाषा में तत्सम,तद्भव तथा देशज शब्दों की प्रचुरता है। उपमा,रूपक,उत्प्रेक्षा एवम् अनुप्रास अलंकारों की छ्टा छिटकी है।भाषा मुहावरेदार तथा वीर एवम् हास्य रस से ओत-प्रोत है। अभिधा,लक्षणा एवम् व्यंजना जैसी शब्द शक्तियों पर विशेष ध्यान रखा है।शैली संवादात्मक होने के कारण प्रसाद , ओज एवम् माधुर्य गुणों के माध्यम से उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति-क्षमता का पूर्ण प्रकटीकरण किया है।


प्रश्न ९ - इस पूरे प्रसंग में व्यंग्य का अनूठा सौन्दर्य है।उदाहरण के साथ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर - प्रस्तुत पाठ के कथा-प्रसंग में कई जगह व्यंग्य का अनूठा सौन्दर्य व्याप्त है।परशुराम के साथ संवाद करते हुए लक्ष्मण का मुसकाना,चिढ़ाना,उपहास करना,खिल्ली उड़ाना आदि ऐसे स्थान हैं जहाँ करारे व्यंग्य के दर्शन होते हैं।उदाहरण के लिए धनुष के टूटने पर परशुराम जी क्रोधित होकर जब समस्त राजाओं को चेतावनी देते हैं तब लक्ष्मण जी कहते हैं कि हमें पता नहीं था कि धनुष टूटने पर आपको क्रोध आ जाता है। दूसरे; परशुराम जी जब क्रोधित अवस्था में अपनी वीरता का बखान करते हैं तब लक्ष्मण जी कहते हैं कि जो कायर होते हैं वे ही शत्रु के सामने डींग हाँकते हैं,वीर तो युद्ध करके अपना परिचय देते हैं।प्रस्तुत पाठ में ऐसे - ऐसे कई और व्यंग्यों की भरमार है।

प्रश्न १० - निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार पहचान कर लिखिए।
(क) बालक बोलि बधौं नहि तोहि।
उत्तर - अनुप्रास अलंकार।
   
(ख) कोटि कुलिस सम वचनु तुम्हारा।
उत्तर - उपमा अलंकार।

(ग) तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा।बार बार मोहि लागि बोलावा॥
उत्तर - उत्प्रेक्षा अलंकार।

(घ) लखन उतर आहुति सरिस भृगुवर कोप कृसानु।
    बढ़त देखि जल सम वचन बोले रघुकुल भानु॥

उत्तर - उपमा एवम् रूपक अलंकार ।

प्रश्न ११ - सामाजिक जीवन में क्रोध की जरूरत बराबर पड़ती है।यदि क्रोध न हो तो मनुष्य दूसरों के द्वारा पहुँचाए जाने वाले बहुत से कष्टों की चिर-निवृत्ति का उपाय ही न कर सके।
उत्तर - पक्ष में-
क्रोध कि गिनती दुर्गुणों में की जाती है।मान्यता है कि यह धारक को क्षति या हानि ही पहुँचाती है,साथ ही यह विनाश का मुख्य कारण भी है।
परन्तु; क्रोध सर्वथा विनाशकारी ही नहीं बल्कि निर्माणकारी भी है।कभी - कभी हमें इसकी सहायता लेनी ही पड़ती है।जैसे घर पे बच्चे यदि पढ़ने के समय भी खेलते रहें,समझाने के बाद भी वे न मानें तब ऐसे में क्रोध जादू जैसा काम करता है।कक्षा में बच्चे शोरगुल करें,अध्यापक की एक न सुनें,ऐसे में क्रोध शांति बहाल करता है।यदि कोई अकारण ही गाली दे,चपत लगा दे,आप प्रेम से समझाएँ फिर भी वह बार-बार दोहराए।इस पर भी आप न बोलें तो यह कायरता है।ऐसे में क्रोध उसके हौसले पस्त कर सकता है।अन्याय , अकर्मण्यता,गुंडागर्दी आदि के विरोध में क्रोध की भूमिका सकारात्मक और चमत्कारपूर्ण होती है।


विपक्ष में-
क्रोध मूलत: नकारात्मक होता है।क्रोध की अवस्था में मनुष्य को भले-बुरे का ज्ञान नहीं रहता।वह उत्तेजना की अवस्था में ऐसे निर्णय करता है जिससे उसे क्षति या हानि उठानी पड़ जाती है।क्रोध अपने को भी पराया कर देता है। द्रौपदी पर कुपित दुर्योधन के क्रोध ने समूचे भरत्वर्ष को महाभारत जैसे युद्ध में झोंक दिया। अत: क्रोध से बच के रहना चाहिए।

प्रश्न १२ - संकलित अंश में राम का व्यवहार विनयपूर्ण और संयत है।लक्ष्मण लगातार व्यंग्य बाणों का उपयोग करते हैंऔर परशुराम का व्यवहार क्रोध से भरा हुआ है।आप अपने आप को इस परिस्थिति मे रखकर लिखें कि आपका व्यवहार कैसा होता?
 
उत्तर - यदि मैं वैसी परिस्थिति में होता तो परशुराम के क्रोध करने पर उनके साथ लक्ष्मण जैसी धृष्टता नहीं करता।परशुराम जब तक सीमा का उल्लंघन नहीं करते,तब तक मैं उनका विरोध भी नहीं करता।आदरणीय परशुराम से शान्त होने और वास्तविकता को समझने का अनुनय - विनय करता।यदि बात नहीं बनती तब मैं कड़े किन्तु संयत शब्दॊं में उनका विरोध करता।वैसी बातों से परहेज करने की कोशिश अवश्य करता जिससे उनका क्रोध बढ़ता हो।  
॥इति शुभम्॥
 विमलेश दत्त दूबे ‘स्वप्नदर्शी’

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